क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जैसे इंसान का ख़ून निकाला जाता है, वैसे ही कोई सूई लगाकर मेरे भीतर से वह सब निकाल…
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जैसे इंसान का ख़ून निकाला जाता है, वैसे ही कोई सूई लगाकर मेरे भीतर से वह सब निकाल लिया जाए जो मुझे बेसुकून करता है? कल्पना कीजिए, डॉक्टर सामने बैठा है। वह मेरी तरफ़ देखता है, मुस्कुराता है और कहता है घबराइए मत, बस थोड़ी-सी बेसुकूनी है, निकाल देंगे। मैं अपनी बाँह आगे कर दूँ। वह एक बारीक-सी सूई लगाए और मेरे भीतर से धीरे-धीरे ग़ुस्सा निकलने लगे, फिर उदासी, फिर बेवजह के ख़याल, फिर पुराने दिनों की धूल, फिर वे तमाम बातें जिनका अब कोई मतलब नहीं है लेकिन जो आज भी दिमाग में अपना किराया वसूलती रहती हैं। एक शीशी भर जाए। डॉक्टर उसे उठाकर रोशनी के सामने देखे और कहे...बस, इतना ही था। मैं पूछूँ....इतना ही? वह कहे...हाँ, अब आप बिल्कुल ठीक हैं। और मैं घर लौट आऊँ। रास्ते में सोचूँ कि इतने सालों से मैं जिस चीज़ को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा समझता रहा, वह दरअसल मेरे भीतर जमा हुआ कोई बेकार-सा तरल था जिसे एक शीशी में भरकर फेंका जा सकता था। काश ऐसा होता।
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