“रेगिस्तान में हम धूप से चमकती हुई रेत को पानी समझकर भागते हैं, धोखा खाते हैं; तड़पते हैं, पर लोग कहते हैं,…
“रेगिस्तान में हम धूप से चमकती हुई रेत को पानी समझकर भागते हैं, धोखा खाते हैं; तड़पते हैं, पर लोग कहते हैं, रेत रेत है, पानी नहीं बन सकती और कुछ सयाने लोग उस रेत को पानी समझने की गलती नहीं करते। वो लोग सयाने होंगे, लेकिन मैं कहता हूं, जो रेत को पानी समझने की गलती नहीं करते, उनकी प्यास में ही कोई कमी होगी, उनके होंठों पर वह शिद्दत नहीं होगी।” -अमृता प्रीतम
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