फणीश्वरनाथ रेणु का परती परिकथा (1957) स्वतंत्रता-उत्तर भारत के ग्रामीण समाज का ऐसा जीवंत आख्यान है, जहाँ नई…
फणीश्वरनाथ रेणु का परती परिकथा (1957) स्वतंत्रता-उत्तर भारत के ग्रामीण समाज का ऐसा जीवंत आख्यान है, जहाँ नई नीतियाँ, बदलती आकांक्षाएँ और ढहते सामंती ढाँचे एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। यह उपन्यास केवल एक कथा नहीं, बल्कि भारतीय गाँव के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संक्रमण का गहरा दस्तावेज़ है। यदि आप हिन्दी उपन्यास को महज़ कहानी नहीं, बल्कि समाज, इतिहास, राजनीति और लोकजीवन के बहुस्तरीय पाठ के रूप में पढ़ना चाहते हैं तो परती परिकथा जरूर पढ़ें। अपनी कलात्मक ऊँचाई और वैचारिक गहराई में हिन्दी के सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है।
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