सोशल मीडिया पर हिन्दी उपन्यासों की चर्चा होती है, तो गुनाहों के देवता का नाम खूब लिया जाता है। यह आपको…
सोशल मीडिया पर हिन्दी उपन्यासों की चर्चा होती है, तो गुनाहों के देवता का नाम खूब लिया जाता है। यह आपको फेसबुक, इंस्टाग्राम रील्स हर जगह मिलेगा, और यह अनायास नहीं है। सरल, भावुक और चंचल पात्रों से युक्त यह उपन्यास युवा पाठकों को सहज आकर्षित करता भी है। वैसे पढ़ने की शुरुआत के लिए यह एक अच्छी रचना है। लेकिन जब इस उपन्यास की तुलना अज्ञेय के नदी के द्वीप से की जाती है, तो यह तुलना कई स्तरों पर असंगत मालूम पड़ती है। मेरे विचार में नदी के द्वीप का संसार बौद्धिक जटिलताओं, मनोवैज्ञानिक गहराइयों और अस्तित्ववादी प्रश्नों से भरा हुआ है। इसके पात्र जीवन के स्थैर्य और आत्म-खोज की प्रक्रिया से गुज़रते हैं, उनके संवादों में दर्शन और आत्मविमर्श की गूंज सुनाई देती है। उनकी भाषा बहुत साहित्यिक और सधि हुई है आम पाठक को बहुत कान लगाकर सुनना पड़ता है। वहीं गुनाहों के देवता के पात्रों में एक किशोर मन की तरलता, भावुकता और चंचलता है। भाषा वहां भी साहित्यिक और सुसंस्कृत है, लेकिन विचार-स्तर पर वो तुलनात्मक रूप से अधिक सपाट और सहज हैं। उसमें दर्शन की झलक तो है, पर गहराई तक उतरने वाला विवेकशील अंतर्द्वंद्व नहीं है। शैली, भाषा, संरचना और दार्शनिक संवेदना हर स्तर पर नदी के द्वीप और गुनाहों के देवता दो अलग साहित्यिक ब्रह्मांड हैं। इसलिए दोनों को एक जैसा कह कर पढ़ने का सुझाव देना मुझे तो ठीक नहीं जान पड़ता है।
Read on on record.